श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 43: गीताका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरका भीष्म, द्रोण, कृप और शल्यसे अनुमति लेकर युद्धके लिये तैयार होना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  6.43.47 
युधिष्ठिर उवाच
हन्त पृच्छामि तस्मात् त्वां पितामह नमोऽस्तु ते।
वधोपायं ब्रवीहि त्वमात्मन: समरे परै:॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले, "पितामह! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। अतः अब मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप मुझे युद्ध में शत्रुओं द्वारा मेरी मृत्यु से बचाने का उपाय बताएँ।"
 
Yudhishthira said, "Grandfather, I salute you. So now I ask you to tell me the way to prevent my death by the enemies in the war." 47
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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