श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 43: गीताका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरका भीष्म, द्रोण, कृप और शल्यसे अनुमति लेकर युद्धके लिये तैयार होना  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  6.43.40 
व्रियतां च वर: पार्थ किमस्मत्तोऽभिकाङ्क्षसि।
एवंगते महाराज न तवास्ति पराजय:॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
पार्थ! वर माँगो। तुम मुझसे क्या चाहते हो? महाराज! ऐसी स्थिति में तुम्हारी पराजय नहीं होगी।॥40॥
 
Parth! Ask for a boon. What do you want from me? Maharaj! In such a situation you will not be defeated. ॥ 40॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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