श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 43: गीताका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरका भीष्म, द्रोण, कृप और शल्यसे अनुमति लेकर युद्धके लिये तैयार होना  »  श्लोक 109
 
 
श्लोक  6.43.109 
ततो जघ्नुर्महाभेरी: शतशश्च सहस्रश:।
शङ्खांश्च गोक्षीरनिभान् दध्मुर्हृष्टा मनस्विन:॥ १०९॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् समस्त बुद्धिमान पुरुष हर्ष में भरकर सैकड़ों-हजारों बड़े-बड़े सींग और शंख बजाने लगे, जो गाय के दूध के समान श्वेत थे॥109॥
 
Thereafter all the wise men filled with joy blew hundreds and thousands of large horns and conches that were as white as cow's milk.॥109॥
 
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि भीष्मादिसम्मानने त्रिचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें भीष्म आदिका समादरविषयक तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४३॥

[दाक्षिणात्य अधिक पाठके तीन श्लोक मिलाकर कुल ११२ श्लोक हैं।]
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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