श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 43: गीताका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरका भीष्म, द्रोण, कृप और शल्यसे अनुमति लेकर युद्धके लिये तैयार होना  »  श्लोक 107
 
 
श्लोक  6.43.107 
साधु साध्विति सर्वत्र निश्चेरु: स्तुतिसंहिता:।
वाच: पुण्या: कीर्तिमतां मनोहृदयहर्षणा:॥ १०७॥
 
 
अनुवाद
यशस्वी पाण्डवों के लिए सब ओर से लोग 'साधु-साधु' कहकर उनकी स्तुति करते थे। वे ऐसे पवित्र वचन सुनते थे जो मन और हृदय के आनन्द को बढ़ाने वाले होते थे॥107॥
 
For the glorious Pandavas, people from all sides used to praise and say 'Sadhu-Sadhu'. They used to hear such holy words which used to increase the joy of mind and heart.॥ 107॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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