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श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 43: गीताका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरका भीष्म, द्रोण, कृप और शल्यसे अनुमति लेकर युद्धके लिये तैयार होना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  6.43.1 
वैशम्पायन उवाच
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यै: शास्त्रसंग्रहै:।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद् विनि:सृता॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं, 'हे जनमेजय, अन्य अनेक शास्त्रों का संग्रह करने की क्या आवश्यकता है? गीता का उचित रूप से पाठ (श्रवण, वाचन, पठन, मनन और स्मरण) करना चाहिए, क्योंकि यह स्वयं भगवान पद्मनाभ के मुख से निकली है।
 
Vaishmpayana says, 'O Janamejaya, what is the need to collect many other scriptures? The Gita should be recited (heard, recited, read, meditated and remembered) properly because it has come out of the mouth of Lord Padmanabha himself.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)