श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 42: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 18: संन्यास योग  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  6.42.56 
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्‍व्यपाश्रय: ।
मत्प्रसादादवाप्‍नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥ ५६ ॥
 
 
अनुवाद
मेरा शुद्ध भक्त मेरी शरण में रहकर सभी प्रकार के कार्यों में संलग्न रहते हुए मेरी कृपा से शाश्वत तथा अविनाशी धाम को प्राप्त करता है।
 
My pure devotee, under my protection, while being engaged in all kinds of activities, attains the eternal and imperishable abode by my grace.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)