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mahabharat 6.42.50: हे कुन्तीपुत्र! मैं तुम्हें संक्षेप में बताता हूँ कि इस सिद्धि को प्राप्त करने वाला मनुष्य किस प्रकार परम सिद्ध अवस्था अर्थात् ब्रह्म अर्थात् परम ज्ञान की अवस्था को प्राप्त करता है। तुम्हें इसे अवश्य जानना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 6.42: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 18: संन्यास योग   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  6.42.50 
सिद्धिं प्राप्‍तो यथा ब्रह्म तथाप्‍नोति निबोध मे ।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥ ५० ॥
 
 
अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! मैं तुम्हें संक्षेप में बताता हूँ कि इस सिद्धि को प्राप्त करने वाला मनुष्य किस प्रकार परम सिद्ध अवस्था अर्थात् ब्रह्म अर्थात् परम ज्ञान की अवस्था को प्राप्त करता है। तुम्हें इसे अवश्य जानना चाहिए।
 
O son of Kunti! I will briefly describe to you the way in which a person who has attained this siddhi attains the supreme siddha state, i.e., Brahma, which is the state of supreme knowledge. You must know it.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)