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श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 42: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 18: संन्यास योग  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  6.42.48 
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्न‍िरिवावृता: ॥ ४८ ॥
 
 
अनुवाद
प्रत्येक प्रयास किसी न किसी दोष से ढका रहता है, जैसे अग्नि धुएँ से ढकी रहती है। इसलिए हे कुन्तीपुत्र! मनुष्य को चाहिए कि वह स्वभाव से उत्पन्न कर्म को कभी न छोड़े, चाहे वह दोषयुक्त ही क्यों न हो।
 
Every effort is covered by some defect, just as fire is covered by smoke. Therefore, O son of Kunti, a man should never give up the work born of his nature, even if it is defective.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)