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श्लोक  6.42.45 
स्वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर
स्वकर्मनिरत: सिद्धिं यथा विन्दति तच्‍छृणु ॥ ४५ ॥
 
 
अनुवाद
प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्म के गुणों का पालन करके पूर्ण बन सकता है। अब सुनो, यह कैसे हो सकता है।
 
Every person can become perfect by following the qualities of his own action. Now listen to me how this can be done.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)