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mahabharat 6.42.37: जो आरंभ में विष के समान प्रतीत होता है, परंतु अंत में अमृत के समान होता है और जो व्यक्ति में आत्म-साक्षात्कार को जागृत करता है, उसे सात्विक सुख कहते हैं।   |   mahabharat अध्याय 6.42: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 18: संन्यास योग   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  6.42.37 
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥ ३७ ॥
 
 
अनुवाद
जो आरंभ में विष के समान प्रतीत होता है, परंतु अंत में अमृत के समान होता है और जो व्यक्ति में आत्म-साक्षात्कार को जागृत करता है, उसे सात्विक सुख कहते हैं।
 
That which seems like poison in the beginning, but is like nectar in the end and which awakens self-realization in a person, is called Sattvik happiness.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)