श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 42: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 18: संन्यास योग  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  6.42.36 
सुखं त्विदानीं त्रिविधं श‍ृणु मे भरतर्षभ ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दु:खान्तं च निगच्छति ॥ ३६ ॥
 
 
अनुवाद
अब मुझसे तीन प्रकार के सुखों के विषय में सुनो, जिनसे बद्धजीव भोगता है और जिनके द्वारा कभी-कभी दुःखों का अन्त हो जाता है।
 
Now hear from me about the three kinds of happiness by which the conditioned soul enjoys and by which sometimes sufferings come to an end.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)