श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 42: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 18: संन्यास योग  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  6.42.31 
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धि: सा पार्थ राजसी ॥ ३१ ॥
 
 
अनुवाद
हे पृथापुत्र! जो बुद्धि धर्म और अधर्म में, तथा करने योग्य और न करने योग्य कर्मों में भेद नहीं कर सकती, वह बुद्धि राजसी है।
 
O son of Pritha! The intellect which cannot differentiate between dharma and adharma, the deeds which should be done and those which should not be done, is a royal one.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)