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mahabharat 6.42.22: और जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य एक ही प्रकार के कर्म को, जो अत्यन्त तुच्छ है, सब कुछ मानकर, सत्य को न जानकर, उसमें प्रवृत्त होता है, वह तामसी कहलाता है।   |   mahabharat अध्याय 6.42: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 18: संन्यास योग   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  6.42.22 
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् ।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
और जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य एक ही प्रकार के कर्म को, जो अत्यन्त तुच्छ है, सब कुछ मानकर, सत्य को न जानकर, उसमें प्रवृत्त होता है, वह तामसी कहलाता है।
 
And that knowledge by which a man indulges in one type of activity, which is very trivial, considering it to be everything, without knowing the truth, is called Tamasi.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)