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mahabharat 6.42.10: सतोगुण में स्थित बुद्धिमान त्यागी, जो न तो बुरे कर्मों से घृणा करता है और न ही शुभ कर्मों में लिप्त होता है, उसे कर्म के विषय में कोई संदेह नहीं रहता।   |   mahabharat अध्याय 6.42: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 18: संन्यास योग   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  6.42.10 
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्ज‍ते ।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशय: ॥ १० ॥
 
 
अनुवाद
सतोगुण में स्थित बुद्धिमान त्यागी, जो न तो बुरे कर्मों से घृणा करता है और न ही शुभ कर्मों में लिप्त होता है, उसे कर्म के विषय में कोई संदेह नहीं रहता।
 
The wise renunciant situated in the mode of goodness, who neither abhors evil deeds nor is involved in auspicious deeds, has no doubts about karma.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)