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श्लोक  6.41.2 
श्रीभगवानुवाच
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श‍ृणु ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान बोले, "जीव द्वारा शरीर में प्राप्त गुणों के अनुसार उसकी श्रद्धा तीन प्रकार की हो सकती है - सात्विक, रजोगुणी या तमोगुणी। अब इस विषय में मुझसे सुनो।"
 
The Lord said, "According to the qualities acquired by a living being in the body, his faith can be of three types - Sattvic, Rajoguni or Tamoguni. Now listen to me about this.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)