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mahabharat 6.41.15: ऐसे वचन बोलना जो सत्य हों, प्रिय हों, हितकारी हों तथा दूसरों को कष्ट न पहुँचाएँ तथा नियमित रूप से वैदिक साहित्य का पाठ करना वाणी की तपस्या है।   |   mahabharat अध्याय 6.41: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 17: श्रद्धा के विभाग   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  6.41.15 
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्‍मयं तप उच्यते ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
ऐसे वचन बोलना जो सत्य हों, प्रिय हों, हितकारी हों तथा दूसरों को कष्ट न पहुँचाएँ तथा नियमित रूप से वैदिक साहित्य का पाठ करना वाणी की तपस्या है।
 
Speaking words that are true, pleasing, beneficial and do not disturb others and regularly reciting Vedic literature is the austerity of speech.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)