श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 41: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 17: श्रद्धा के विभाग  » 
 
 
अध्याय 41: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 17: श्रद्धा के विभाग
 
श्लोक 1:  अर्जुन बोले - हे कृष्ण! जो लोग शास्त्रविधि का पालन न करके अपनी ही कल्पना के अनुसार उपासना करते हैं, उनकी क्या गति होती है? क्या वे सत्वगुण, रजोगुण या तमोगुण में होते हैं?
 
श्लोक 2:  भगवान बोले, "जीव द्वारा शरीर में प्राप्त गुणों के अनुसार उसकी श्रद्धा तीन प्रकार की हो सकती है - सात्विक, रजोगुणी या तमोगुणी। अब इस विषय में मुझसे सुनो।"
 
श्लोक 3:  हे भारतपुत्र! मनुष्य अपने विभिन्न गुणों के अनुसार एक विशेष प्रकार की भक्ति विकसित करता है। जीव को उसके द्वारा अर्जित गुणों के अनुसार विशेष भक्ति वाला कहा जाता है।
 
श्लोक 4:  सत्व गुण वाले लोग देवताओं की पूजा करते हैं, रजो गुण वाले लोग यक्षों और राक्षसों की पूजा करते हैं और तमो गुण वाले लोग भूत-प्रेतों की पूजा करते हैं।
 
श्लोक 5-6:  जो लोग अहंकार और अहंकार से ग्रस्त होकर शास्त्रविरुद्ध कठोर तप और व्रत करते हैं, जो काम और आसक्ति से प्रेरित होते हैं, जो मूर्ख हैं तथा जो शरीर के भौतिक तत्त्वों के साथ-साथ शरीर में स्थित परमात्मा को भी हानि पहुँचाते हैं, वे राक्षस कहलाते हैं।
 
श्लोक 7:  प्रत्येक व्यक्ति को जो भोजन प्रिय होता है, वह भी स्वभाव के अनुसार तीन प्रकार का होता है। यज्ञ, तप और दान भी तीन प्रकार के होते हैं। अब इनके भेद सुनो।
 
श्लोक 8:  जो भोजन सात्विक लोगों को प्रिय हो, आयु बढ़ाता हो, जीवन को शुद्ध करता हो, बल, स्वास्थ्य, सुख और संतुष्टि प्रदान करता हो, ऐसा भोजन रसीला, चिकना, स्वास्थ्यवर्धक और हृदय को प्रसन्न करने वाला हो।
 
श्लोक 9:  रजोगुणी लोगों को बहुत कड़वा, खट्टा, नमकीन, तीखा, मसालेदार, रूखा और जलन पैदा करने वाला भोजन पसंद होता है। ऐसे भोजन से दुःख, शोक और रोग उत्पन्न होते हैं।
 
श्लोक 10:  जो भोजन खाने से तीन घंटे से अधिक समय पहले पकाया गया हो, स्वादहीन, सड़ा हुआ, दूषित और अस्पृश्य पदार्थों से युक्त हो, वह तामसी मनःस्थिति वाले लोगों को प्रिय होता है।
 
श्लोक 11:  समस्त यज्ञों में वही यज्ञ सात्विक है जो शास्त्रों के निर्देशानुसार उन लोगों द्वारा किया जाता है जो इसे अपना कर्तव्य मानते हैं और कर्मों के फल की इच्छा नहीं रखते।
 
श्लोक 12:  परन्तु हे भरतश्रेष्ठ! जो भी यज्ञ किसी भौतिक लाभ के लिए या अहंकारवश किया जाता है, उसे तुम्हें राजसी ही समझना चाहिए।
 
श्लोक 13:  जो यज्ञ शास्त्रों के निर्देशों का पालन किए बिना, प्रसाद वितरित किए बिना, वैदिक मंत्रों का पाठ किए बिना, पुरोहितों को दक्षिणा दिए बिना और श्रद्धा के बिना किया जाता है, वह तामसी माना जाता है।
 
श्लोक 14:  परमात्मा, ब्राह्मण, गुरु, माता-पिता आदि बड़ों की पूजा करना तथा पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा का पालन करना शारीरिक तपस्या है।
 
श्लोक 15:  ऐसे वचन बोलना जो सत्य हों, प्रिय हों, हितकारी हों तथा दूसरों को कष्ट न पहुँचाएँ तथा नियमित रूप से वैदिक साहित्य का पाठ करना वाणी की तपस्या है।
 
श्लोक 16:  और संतोष, सरलता, गंभीरता, आत्म-संयम और जीवन की पवित्रता - ये मन की तपस्याएँ हैं।
 
श्लोक 17:  ये तीन प्रकार की तपस्याएँ, जो भौतिक लाभ की इच्छा न रखने वाले तथा केवल भगवान के प्रति समर्पित लोगों द्वारा दिव्य श्रद्धा के साथ की जाती हैं, सात्विक तपस्या कहलाती हैं।
 
श्लोक 18:  जो तप अभिमानपूर्वक, मान, प्रतिष्ठा और पूजा पाने के लिए किया जाता है, उसे राजसी (रजोगुणी) कहते हैं। वह न तो स्थायी होता है और न ही शाश्वत।
 
श्लोक 19:  जो तपस्या मूर्खतावश स्वयं को कष्ट देने या दूसरों को हानि पहुँचाने के लिए की जाती है, उसे तामसी कहते हैं।
 
श्लोक 20:  जो दान कर्तव्य समझकर, बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के, सही समय, स्थान और सही व्यक्ति को दिया जाता है, उसे सात्विक माना जाता है।
 
श्लोक 21:  परन्तु जो दान बदले में कुछ पाने की इच्छा से या कर्म के फल की इच्छा से या अनिच्छा से किया जाता है, उसे रजोगुणी (राजस) कहते हैं।
 
श्लोक 22:  और जो दान अशुभ स्थान पर, अनुचित समय पर, अयोग्य व्यक्ति को या उचित ध्यान और सम्मान के बिना दिया जाता है, उसे तामसी कहा जाता है।
 
श्लोक 23:  सृष्टि के आरंभ से ही, ॐ तत् सत् इन तीन शब्दों का प्रयोग परम सत्ता को दर्शाने के लिए किया जाता रहा है। इन तीन प्रतीकात्मक अभिव्यक्तियों का प्रयोग ब्राह्मण वैदिक मंत्रों का पाठ करते समय और ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए यज्ञों के दौरान करते थे।
 
श्लोक 24:  अतः ब्रह्म की प्राप्ति के लिए योगीजन सर्वदा यज्ञ, दान और तप आदि सभी कर्मों का प्रारम्भ शास्त्रोक्त विधि से ॐ से करते हैं।
 
श्लोक 25:  मनुष्य को चाहिए कि वह कर्मों के फल की इच्छा न रखते हुए 'तत्' शब्द कहकर नाना प्रकार के यज्ञ, तप और दान आदि कर्म करे। ऐसे दिव्य कर्मों का उद्देश्य जीवन-बन्धन से मुक्त होना है।
 
श्लोक 26-27:  परम सत्य ही भक्तिमय यज्ञ का लक्ष्य है और उसे 'सत्' कहते हैं। हे पृथापुत्र! ऐसे यज्ञ का कर्ता भी 'सत्' कहलाता है, जैसे परमात्मा को प्रसन्न करने के लिए किए जाने वाले यज्ञ, तप और दान आदि सभी कर्म भी 'सत्' हैं।
 
श्लोक 28:  हे पार्थ! श्रद्धा के बिना जो भी यज्ञ, दान या तप किया जाता है, वह नाशवान है। उसे 'असत्' कहते हैं और वह इस जन्म तथा अगले जन्म में व्यर्थ हो जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)