श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 40: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 16: दैवी तथा आसुरी स्वभाव  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  6.40.24 
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
अतः मनुष्य को शास्त्रों के अनुसार अपने कर्तव्य और अकर्तव्य को जानना चाहिए तथा ऐसे विधि-विधानों को जानकर ही अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, जिससे वह क्रमशः ऊपर उठ सके।
 
Therefore, a man should know what is his duty and what is his non-duty as per the rules of the scriptures. He should perform his duties after knowing such rules and regulations so that he can gradually rise higher.
 
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्‍गीतापर्वणि श्रीमद्भगवद्‍गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे दैवासुरसम्पद्विभागयोगो नाम षोडशोऽध्याय:॥ १६॥ भीष्मपर्वणि तु चत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्‍गीतापर्वके अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशास्त्ररूप श्रीमद्भगवद्‍गीतोपनिषद, श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें दैवासुरसम्पद्विभागयोग नामक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १६॥ भीष्मपर्वमें चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४०॥

 
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