श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 40: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 16: दैवी तथा आसुरी स्वभाव  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  6.40.22 
एतैर्विमुक्त: कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नर: ।
आचरत्यात्मन: श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! जो मनुष्य इन तीनों नरक के द्वारों से बच निकलता है, वह आत्म-साक्षात्कार के लिए शुभ कर्म करता है और इस प्रकार धीरे-धीरे परम मोक्ष को प्राप्त करता है।
 
O son of Kunti! The person who escapes from these three gates of hell performs auspicious acts for self-realization and thus gradually attains the ultimate salvation.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)