Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 6.40.11-12: वे इंद्रियों की तृप्ति को मानव सभ्यता की मूलभूत आवश्यकता मानते हैं। इसीलिए वे मृत्युपर्यंत अत्यंत चिंतित रहते हैं। वे करोड़ों इच्छाओं के जाल में फँसकर और काम-क्रोध में लीन होकर इंद्रिय-तृप्ति के लिए अवैध रूप से धन-संग्रह करते हैं। | mahabharat अध्याय 6.40: श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 16: दैवी तथा आसुरी स्वभाव । mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिता: ।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिता: ॥ ११ ॥
आशापाशशतैर्बद्धा: कामक्रोधपरायणा: ।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् ॥ १२ ॥
अनुवाद
वे इंद्रियों की तृप्ति को मानव सभ्यता की मूलभूत आवश्यकता मानते हैं। इसीलिए वे मृत्युपर्यंत अत्यंत चिंतित रहते हैं। वे करोड़ों इच्छाओं के जाल में फँसकर और काम-क्रोध में लीन होकर इंद्रिय-तृप्ति के लिए अवैध रूप से धन-संग्रह करते हैं।
They believe that satisfaction of senses is the basic need of human civilization. Thus, they remain extremely worried till the time of death. They collect wealth illegally for sense gratification by getting entangled in the web of millions of desires and being absorbed in lust and anger.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥