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श्लोक 6.4.7  |
देशानां च परीमाणं नगराणां च संजय।
श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन यत एते समागता:॥ ७॥ |
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| अनुवाद |
| ‘संजय! मैं तुमसे उन देशों और नगरों का वास्तविक आकार सुनना चाहता हूँ जहाँ से ये लोग आये हैं।॥ 7॥ |
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| ‘Sanjay! I wish to hear from you the true size of the countries and cities from where these people have come.॥ 7॥ |
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