श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 4: धृतराष्ट्रके पूछनेपर संजयके द्वारा भूमिके महत्त्वका वर्णन  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  6.4.12 
नानारूपधरा राजंस्तेषां भेदाश्चतुर्दश।
वेदोक्ता: पृथिवीपाल येषु यज्ञा: प्रतिष्ठिता:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
उनके अनेक प्रकार के रूप हैं। हे राजन! उनके चौदह प्रकार हैं, जिनका वर्णन वेदों में है। हे राजन! उनमें यज्ञों को प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त है।॥12॥
 
They have various types of forms. O King! They have fourteen kinds, which are mentioned in the Vedas. O King! Yagyas have a place of prestige in them.॥ 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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