सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥ १५ ॥
अनुवाद
मैं प्रत्येक प्राणी के हृदय में निवास करता हूँ और मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और विस्मृति प्राप्त होती है। मैं ही वेदों के द्वारा जाना जा सकता हूँ। निःसंदेह मैं ही वेदान्त का संकलनकर्ता और समस्त वेदों का ज्ञाता हूँ।
I reside in the heart of every living being and it is from me that memory, knowledge and forgetfulness come. I am the one who can be known through the Vedas. Undoubtedly I am the compiler of Vedanta and the knower of all the Vedas.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥