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mahabharat 6.39.11: जो योगी आत्म-साक्षात्कार के लिए प्रयत्नशील हैं, वे यह सब स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। किन्तु जिनका मन विकसित नहीं है और जिन्हें आत्म-साक्षात्कार नहीं हुआ है, वे प्रयत्न करने पर भी यह नहीं देख पाते कि क्या हो रहा है।   |   mahabharat अध्याय 6.39: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  6.39.11 
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतस: ॥ ११ ॥
 
 
अनुवाद
जो योगी आत्म-साक्षात्कार के लिए प्रयत्नशील हैं, वे यह सब स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। किन्तु जिनका मन विकसित नहीं है और जिन्हें आत्म-साक्षात्कार नहीं हुआ है, वे प्रयत्न करने पर भी यह नहीं देख पाते कि क्या हो रहा है।
 
Yogis who are striving to attain self-realization can see all this clearly. But those whose minds are not developed and who have not attained self-realization are unable to see what is happening even after trying.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)