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श्लोक 6.38.9  |
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रज: कर्मणि भारत ।
ज्ञानमावृत्य तु तम: प्रमादे सञ्जयत्युत ॥ ९ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे भारतपुत्र! सत्वगुण मनुष्य को सुख से, रजोगुण उसे सकाम कर्मों से और तमोगुण मनुष्य के ज्ञान को ढककर उसे उन्माद से बाँधता है। |
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| O son of Bharata! Satva Guna binds a man with pleasure, Rajo Guna binds him with fruitive actions and Tamo Guna covers the knowledge of a man and binds him with madness. |
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