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श्लोक 6.38.27  |
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥ २७ ॥ |
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| अनुवाद |
| और मैं उस निराकार ब्रह्म का आश्रय हूँ, जो अमर, अविनाशी और शाश्वत है तथा परम आनंद का स्वाभाविक पद है। |
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| And I am the refuge of that formless Brahman, who is immortal, indestructible and eternal and is the natural position of ultimate bliss. |
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इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतापर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्याय:॥ १४॥ भीष्मपर्वणि तु अष्टात्रिंशोऽध्याय:॥ ३८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्गीतापर्वके अन्तर्गत ब्रह्मविद्या और योगशास्त्ररूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्में, श्रीकृष्णार्जुन-संवादमें गुणत्रयविभागयोग नामक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४॥ भीष्मपर्वमें अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३८॥
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