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mahabharat 6.38.19: जब मनुष्य यह भली-भाँति समझ लेता है कि समस्त कर्मों में प्रकृति के तीन गुणों के अतिरिक्त कोई कर्ता नहीं है और जब वह इन तीनों गुणों से परे परमेश्वर को जान लेता है, तो वह मेरे दिव्य स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।   |   mahabharat अध्याय 6.38: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 14: प्रकृति के तीन गुण   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 38: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 14: प्रकृति के तीन गुण  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  6.38.19 
नान्यं गुणेभ्य: कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भ‍ावं सोऽधिगच्छति ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
जब मनुष्य यह भली-भाँति समझ लेता है कि समस्त कर्मों में प्रकृति के तीन गुणों के अतिरिक्त कोई कर्ता नहीं है और जब वह इन तीनों गुणों से परे परमेश्वर को जान लेता है, तो वह मेरे दिव्य स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।
 
When one thoroughly understands that in all actions there is no doer other than the three modes of nature and when he knows the Supreme Lord who is beyond these three modes, he attains My divine nature.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)