Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 6.38.16: पुण्य कर्मों का फल शुद्ध होता है और उसे सात्विक कहा जाता है। परंतु रजोगुण में किए गए कर्मों का फल दुःख होता है और तमोगुण में किए गए कर्मों का फल मूढ़ता होता है।   |   mahabharat अध्याय 6.38: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 14: प्रकृति के तीन गुण   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 38: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 14: प्रकृति के तीन गुण  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  6.38.16 
कर्मण: सुकृतस्याहु: सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।
रजसस्तु फलं दु:खमज्ञानं तमस: फलम् ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
पुण्य कर्मों का फल शुद्ध होता है और उसे सात्विक कहा जाता है। परंतु रजोगुण में किए गए कर्मों का फल दुःख होता है और तमोगुण में किए गए कर्मों का फल मूढ़ता होता है।
 
The result of pious deeds is pure and is called Sattvik. But the result of deeds done in Rajoguna is suffering and deeds done in Tamoguna result in foolishness.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)