| श्री महाभारत » पर्व 6: भीष्म पर्व » अध्याय 38: श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 14: प्रकृति के तीन गुण » श्लोक 12 |
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| | | | श्लोक 6.38.12  | लोभ: प्रवृत्तिरारम्भ: कर्मणामशम: स्पृहा ।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥ १२ ॥ | | | | | | अनुवाद | | हे भारतवंशियों में श्रेष्ठ! जब रजोगुण बढ़ता है, तब अत्यधिक आसक्ति, सकाम कर्म, तीव्र चेष्टाएँ तथा अनियंत्रित इच्छा और तृष्णा के लक्षण प्रकट होते हैं। | | | | O chief among the people of Bharat! When Rajogun increases, symptoms of excessive attachment, fruitive actions, intense endeavors and uncontrolled desire and craving appear. | | ✨ ai-generated | | |
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