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mahabharat 6.37.35: जो लोग ज्ञान के नेत्रों से शरीर और शरीर के ज्ञाता का भेद देख लेते हैं तथा जीवन-बन्धन से मुक्ति का उपाय भी जान लेते हैं, वे परम गति को प्राप्त हो जाते हैं।   |   mahabharat अध्याय 6.37: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 37: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  6.37.35 
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
जो लोग ज्ञान के नेत्रों से शरीर और शरीर के ज्ञाता का भेद देख लेते हैं तथा जीवन-बन्धन से मुक्ति का उपाय भी जान लेते हैं, वे परम गति को प्राप्त हो जाते हैं।
 
Those who, with the eyes of knowledge, see the difference between the body and the knower of the body and also know the method of liberation from the bondage of life, attain the ultimate goal.
 
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्‍गीतापर्वणि श्रीमद्भगवद्‍गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगो नाम त्रयोदशोऽध्याय:॥ १३॥ भीष्मपर्वणि तु सप्तत्रिंशोऽध्याय:॥ ३७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्‍गीतापर्वके अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशास्त्ररूप श्रीमद्भगवद्‍गीतोपनिषद्, श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगनामक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३॥ भीष्मपर्वमें सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३७॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)