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mahabharat 6.37.22: इस प्रकार जीव प्रकृति के तीनों गुणों का भोग करता है और प्रकृति में ही अपना जीवन व्यतीत करता है। यह उस प्रकृति के साथ उसके संबंध के कारण होता है। इस प्रकार उसे अच्छे-बुरे जन्म मिलते रहते हैं।   |   mahabharat अध्याय 6.37: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 37: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  6.37.22 
पुरुष: प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् ।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार जीव प्रकृति के तीनों गुणों का भोग करता है और प्रकृति में ही अपना जीवन व्यतीत करता है। यह उस प्रकृति के साथ उसके संबंध के कारण होता है। इस प्रकार उसे अच्छे-बुरे जन्म मिलते रहते हैं।
 
In this way, the living being enjoys the three qualities of nature and spends his life in nature. This is due to his association with that nature. In this way, he keeps getting good and bad births.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)