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सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥ १५ ॥
अनुवाद
परम पुरुष समस्त इन्द्रियों का मूल है, फिर भी वह इन्द्रियों से रहित है। वह समस्त जीवों का पालनकर्ता है, फिर भी वह अनासक्त है। वह प्रकृति के गुणों से परे है, फिर भी वह प्रकृति के समस्त गुणों का स्वामी है।
The Supreme Being is the source of all senses, yet He is devoid of senses. He is the maintainer of all living entities, yet He is detached. He is beyond the modes of nature, yet He is the master of all the modes of material nature.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥