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mahabharat 6.36.3-4: परन्तु जो लोग अपनी इन्द्रियों को वश में करके तथा सबके प्रति समभाव रखते हुए, उस अव्यक्त, जो इन्द्रियबोध से परे, सर्वव्यापी, अचिन्त्य, अपरिवर्तनशील, अचल और अचल है, उस निराकार परम सत्य की भावना के अंतर्गत पूर्णतः भजते हैं, वे समस्त प्राणियों के कल्याण में प्रवृत्त होकर अन्त में मुझे ही प्राप्त होते हैं।   |   mahabharat अध्याय 6.36: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 12: भक्तियोग   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 36: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 12: भक्तियोग  »  श्लोक 3-4
 
 
श्लोक  6.36.3-4 
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥ ३ ॥
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धय: ।
ते प्राप्‍नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रता: ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
परन्तु जो लोग अपनी इन्द्रियों को वश में करके तथा सबके प्रति समभाव रखते हुए, उस अव्यक्त, जो इन्द्रियबोध से परे, सर्वव्यापी, अचिन्त्य, अपरिवर्तनशील, अचल और अचल है, उस निराकार परम सत्य की भावना के अंतर्गत पूर्णतः भजते हैं, वे समस्त प्राणियों के कल्याण में प्रवृत्त होकर अन्त में मुझे ही प्राप्त होते हैं।
 
But those who, by controlling their senses and being equanimous towards all, completely worship the Unmanifested, who is beyond sense perception, omnipresent, unimaginable, unchangeable, immovable and immovable, under the formless concept of the Supreme Truth, they, by engaging in the welfare of all beings, ultimately attain Me.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)