Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 6.36.18-19: जो मित्र और शत्रुओं के प्रति समभाव रखता है, जो मान-अपमान, सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख, यश-अपयश से उदासीन रहता है, जो कुसंगति से सर्वदा दूर रहता है, जो सदैव मौन रहता है और किसी भी बात से संतुष्ट रहता है, जो किसी भी प्रकार की गृहस्थी की चिंता नहीं करता, जो ज्ञान में दृढ़ है और जो भक्ति में तत्पर है - ऐसा पुरुष मुझे अत्यंत प्रिय है। | mahabharat अध्याय 6.36: श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 12: भक्तियोग । mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
सम: शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयो: ।
शीतोष्णसुखदु:खेषु सम: सङ्गविवर्जित: ॥ १८ ॥
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।
अनिकेत: स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नर: ॥ १९ ॥
अनुवाद
जो मित्र और शत्रुओं के प्रति समभाव रखता है, जो मान-अपमान, सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख, यश-अपयश से उदासीन रहता है, जो कुसंगति से सर्वदा दूर रहता है, जो सदैव मौन रहता है और किसी भी बात से संतुष्ट रहता है, जो किसी भी प्रकार की गृहस्थी की चिंता नहीं करता, जो ज्ञान में दृढ़ है और जो भक्ति में तत्पर है - ऐसा पुरुष मुझे अत्यंत प्रिय है।
He who is the same to friends and foes, who is indifferent to honour and dishonour, cold and heat, pleasure and pain, fame and infamy, who is always free from evil association, who is always silent and satisfied with anything, who does not care for any kind of household, who is firm in knowledge and who is engaged in devotion - such a man is very dear to me.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥