श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 36: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 12: भक्तियोग  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  6.36.13-14 
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्र: करुण एव च ।
निर्ममो निरहङ्कार: समदु:खसुख: क्षमी ॥ १३ ॥
सन्तुष्ट: सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चय: ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भ‍क्त: स मे प्रिय: ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
जो किसी से द्वेष नहीं करता, अपितु समस्त जीवों का दयालु मित्र है, जो अपने को स्वामी नहीं मानता, मिथ्या अहंकार से मुक्त है, जो सुख-दुःख में सम रहता है, सहनशील है, सदैव आत्मसंतुष्ट है, आत्मसंयमी है तथा जो मन-बुद्धि को मुझमें स्थिर करके भक्ति में रत रहता है, ऐसा भक्त मुझे अत्यंत प्रिय है।
 
He who does not hate anyone but is a compassionate friend of all living beings, who does not consider himself a master and is free from false ego, who remains equal in happiness and sorrow, is tolerant, is always self-satisfied, self-controlled and who remains engaged in devotional service with his mind and intellect fixed on Me, such a devotee is very dear to Me.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas