Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 6.35.55: हे अर्जुन! जो स्वार्थ और मानसिक कर्मों के कल्मष से मुक्त है, जो मेरी शुद्ध भक्ति में लीन रहता है, जो केवल मेरे लिए ही कर्म करता है, जो मुझे ही अपने जीवन का लक्ष्य मानता है और जो प्रत्येक जीव के साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार रखता है, वह निश्चय ही मुझे प्राप्त होता है। | mahabharat अध्याय 6.35: श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11: विराट रूप । mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
हे अर्जुन! जो स्वार्थ और मानसिक कर्मों के कल्मष से मुक्त है, जो मेरी शुद्ध भक्ति में लीन रहता है, जो केवल मेरे लिए ही कर्म करता है, जो मुझे ही अपने जीवन का लक्ष्य मानता है और जो प्रत्येक जीव के साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार रखता है, वह निश्चय ही मुझे प्राप्त होता है।
O Arjuna, he who is free from the contamination of selfish activities and mental activities, who remains devoted to My pure devotion, who acts only for My sake, who considers Me as the goal of his life and who is friendly with every living being, he certainly attains Me.
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतापर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नामैकादशोऽध्याय:॥ ११॥ भीष्मपर्वणि तु पञ्चत्रिंशोऽध्याय:॥ ३५॥
इस प्रकार महाभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्गीतापर्वके अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशास्त्ररूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्, श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें विश्वरूपदर्शनयोगनामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११॥ भीष्मपर्वमें पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥