Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 6.35.54: हे अर्जुन! अनन्य भक्ति से ही मैं तुम्हारे सामने खड़ा हूँ, इस प्रकार समझा जा सकता हूँ और साक्षात् देखा जा सकता हूँ। इसी विधि से तुम मेरे ज्ञान के रहस्य को प्राप्त कर सकते हो।   |   mahabharat अध्याय 6.35: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 11: विराट रूप   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 35: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 11: विराट रूप  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  6.35.54 
भक्त्य‍ा त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ॥ ५४ ॥
 
 
अनुवाद
हे अर्जुन! अनन्य भक्ति से ही मैं तुम्हारे सामने खड़ा हूँ, इस प्रकार समझा जा सकता हूँ और साक्षात् देखा जा सकता हूँ। इसी विधि से तुम मेरे ज्ञान के रहस्य को प्राप्त कर सकते हो।
 
O Arjuna! Only by exclusive devotion can I be understood as I stand before you and in the same way I can be seen in person. Only by this method can you attain the secret of my knowledge.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)