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mahabharat 6.35.49: मेरे इस भयानक रूप को देखकर तुम अत्यंत व्याकुल और मोहित हो गए हो। अब मैं इसका अंत करता हूँ। हे मेरे भक्त! अब तुम पुनः समस्त चिंताओं से मुक्त हो गए हो। अब तुम शान्त मन से अपने इच्छित रूप का दर्शन कर सकते हो।   |   mahabharat अध्याय 6.35: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 11: विराट रूप   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 35: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 11: विराट रूप  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  6.35.49 
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो
दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्‍ममेदम् ।
व्यपेतभी: प्रीतमना: पुनस्त्वं
तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥ ४९ ॥
 
 
अनुवाद
मेरे इस भयानक रूप को देखकर तुम अत्यंत व्याकुल और मोहित हो गए हो। अब मैं इसका अंत करता हूँ। हे मेरे भक्त! अब तुम पुनः समस्त चिंताओं से मुक्त हो गए हो। अब तुम शान्त मन से अपने इच्छित रूप का दर्शन कर सकते हो।
 
You have become extremely agitated and fascinated by seeing this fearful form of mine. Now I am ending this. O my devotee! You are free from all worries once again. You can now see the form you desire with a peaceful mind.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)