श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 35: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 11: विराट रूप  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  6.35.48 
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै-
र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रै: ।
एवंरूप: शक्य अहं नृलोके
द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥ ४८ ॥
 
 
अनुवाद
हे कुरुश्रेष्ठ! तुमसे पहले किसी ने भी मेरे विराट रूप को नहीं देखा था, क्योंकि इस संसार में वेदों के अध्ययन से, यज्ञ, दान, पुण्य कर्मों से अथवा घोर तप करने से भी मुझे इस रूप में नहीं देखा जा सकता।
 
O best of the Kurus! Before you, no one had seen my cosmic form because I cannot be seen in this form in this world either by studying the Vedas, or by performing sacrifices, charity, good deeds or by performing severe penance.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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