|
| |
| |
श्लोक 6.35.47  |
श्रीभगवानुवाच
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं
रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं
यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥ ४७ ॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| भगवान बोले- हे अर्जुन! मैंने प्रसन्न होकर अपनी अन्तरात्मा की शक्ति से तुम्हें इस संसार में अपना परम विराट् रूप दिखाया है। इससे पूर्व इस अनन्त एवं तेजस्वी आदिम रूप को किसी ने भी नहीं देखा था। |
| |
| God said- O Arjun! I am pleased and have shown you my supreme cosmic form in this world by the power of my inner power. Before this, no one else had ever seen this infinite and radiant primal form. |
| ✨ ai-generated |
| |
|