श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 35: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 11: विराट रूप  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  6.35.43 
पितासि लोकस्य चराचरस्य
त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिक: कुतोऽन्यो
लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥ ४३ ॥
 
 
अनुवाद
आप इस समस्त चराचर और चराचर जगत के पिता हैं। आप परम पूजनीय और महान आध्यात्मिक गुरु हैं। न तो कोई आपके समान है और न ही कोई आपके समान हो सकता है। हे अपार पराक्रमी प्रभु! तीनों लोकों में आपसे बड़ा कोई कैसे हो सकता है?
 
You are the father of this entire visible universe, movable and immovable. You are the most revered and great spiritual Guru. No one is equal to you, nor can anyone be equal to you. O Lord of immeasurable power! How can anyone be greater than you in the three worlds?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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