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mahabharat 6.35.24: हे सर्वव्यापी विष्णु! नाना प्रकार के प्रकाशमान रंगों से आच्छादित, आकाश को स्पर्श करते, मुख फैलाए और नेत्रों को चमकाते हुए आपको देखकर मैं भय से काँप उठता हूँ। मैं न तो धैर्य रख पाता हूँ और न ही मानसिक संतुलन बनाए रख पाता हूँ।   |   mahabharat अध्याय 6.35: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 11: विराट रूप   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 35: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 11: विराट रूप  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  6.35.24 
नभ:स्पृशं दीप्‍तमनेकवर्णं
व्यात्ताननं दीप्‍तविशालनेत्रम् ।
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा
धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
हे सर्वव्यापी विष्णु! नाना प्रकार के प्रकाशमान रंगों से आच्छादित, आकाश को स्पर्श करते, मुख फैलाए और नेत्रों को चमकाते हुए आपको देखकर मैं भय से काँप उठता हूँ। मैं न तो धैर्य रख पाता हूँ और न ही मानसिक संतुलन बनाए रख पाता हूँ।
 
O omnipresent Vishnu! I am agitated with fear when I see you, who is covered in various luminous colours, touching the sky, with your mouth wide open and your eyes shining. I am unable to maintain patience or maintain mental balance.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)