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mahabharat 6.35.17: आपके इस रूप को देखना कठिन है क्योंकि यह अत्यंत चमकीला है, जैसे प्रज्वलित अग्नि या सूर्य के अनंत प्रकाश के समान, तथापि मैं इस तेजस्वी रूप को सर्वत्र देख सकता हूँ, जो अनेक मुकुटों, गदाओं और चक्रों से सुशोभित है।   |   mahabharat अध्याय 6.35: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 11: विराट रूप   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 35: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 11: विराट रूप  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  6.35.17 
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च
तेजोराशिं सर्वतो दीप्‍तिमन्तम् ।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता-
द्दीप्‍तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
आपके इस रूप को देखना कठिन है क्योंकि यह अत्यंत चमकीला है, जैसे प्रज्वलित अग्नि या सूर्य के अनंत प्रकाश के समान, तथापि मैं इस तेजस्वी रूप को सर्वत्र देख सकता हूँ, जो अनेक मुकुटों, गदाओं और चक्रों से सुशोभित है।
 
It is difficult to see Your form because of its dazzling brilliance, as it spreads all around like a blazing fire or like the infinite light of the sun. Still, I can see this effulgent form everywhere, which is adorned with many crowns, maces and discuses.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)