श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 35: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 11: विराट रूप  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  6.35.10-11 
अनेकवक्‍त्रनयनमनेकाद्भ‍ुतदर्शनम् ।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥ १० ॥
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥ ११ ॥
 
 
अनुवाद
अर्जुन ने उस विराट रूप को देखा, जिसके असंख्य मुख, असंख्य नेत्र और असंख्य अद्भुत दृश्य थे। यह रूप अनेक दिव्य आभूषणों से सुशोभित था और अनेक दिव्य अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए था। इसने दिव्य मालाएँ और वस्त्र धारण किए हुए थे और इस पर अनेक दिव्य सुगंधियाँ लगी हुई थीं। सब कुछ अद्भुत, तेजस्वी, असीम और सर्वव्यापी था।
 
Arjuna saw that cosmic form with innumerable faces, innumerable eyes and innumerable wonderful sights. This form was adorned with many divine ornaments and was carrying many divine weapons. It was wearing divine garlands and clothes and many divine perfumes were applied on it. Everything was wonderful, radiant, limitless and omnipresent.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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