श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 34: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 10: श्रीभगवान् का ऐश्वर्य  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  6.34.42 
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
परन्तु हे अर्जुन! इस विशाल ज्ञान की क्या आवश्यकता है? मैं अपने एक अंश मात्र से ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त हूँ और इस प्रकार इसका स्वामी हूँ।
 
But, O Arjuna, what is the need for all this vast knowledge? I pervade the entire universe with just a part of myself and thus possess it.
 
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्‍गीतापर्वणि श्रीमद्भगवद्‍गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विभूतियोगो नाम दशमोऽध्याय:॥ १०॥ भीष्मपर्वणि तु चतुस्त्रिंशोऽध्याय:॥ ३४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्‍गीतापर्वके अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशास्त्ररूप श्रीमद्भगवद्‍गीतोपनिषद्, श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें विभूतियोग नामक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०॥ भीष्मपर्वमें चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३४॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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