श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 34: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 10: श्रीभगवान् का ऐश्वर्य  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  6.34.35 
बृहत्साम तथा साम्न‍ां गायत्री छन्दसामहम् ।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकर: ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
मैं सामवेद की ऋचाओं में बृहत्साम और गायत्री की ऋचाओं में वृहत्साम हूँ। मैं सभी महीनों में मार्गशीर्ष (अगहन) हूँ और सभी ऋतुओं में पुष्पों से युक्त वसन्त ऋतु हूँ।
 
I am Brihatsama in the songs of Samveda and Gayatri in the verses. Among all the months I am Margashirsha (Agahan) and among all the seasons I am the flower-bearing spring.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)