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श्लोक 6.34.35  |
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकर: ॥ ३५ ॥ |
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| अनुवाद |
| मैं सामवेद की ऋचाओं में बृहत्साम और गायत्री की ऋचाओं में वृहत्साम हूँ। मैं सभी महीनों में मार्गशीर्ष (अगहन) हूँ और सभी ऋतुओं में पुष्पों से युक्त वसन्त ऋतु हूँ। |
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| I am Brihatsama in the songs of Samveda and Gayatri in the verses. Among all the months I am Margashirsha (Agahan) and among all the seasons I am the flower-bearing spring. |
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