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श्लोक 6.34.18  |
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
भूय: कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥ १८ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे जनार्दन! कृपया एक बार फिर अपने ऐश्वर्य और योगशक्ति का विस्तारपूर्वक वर्णन करें। मैं आपके विषय में सुनकर कभी तृप्त नहीं होता, क्योंकि जितना अधिक मैं आपके विषय में सुनता हूँ, उतना ही अधिक मैं आपके वचनों के अमृत का आस्वादन करना चाहता हूँ। |
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| O Janardana! Please describe your opulence and yogic powers in detail once again. I am never satisfied with hearing about you, because the more I hear about you, the more I want to taste the nectar of your words. |
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