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श्लोक 6.34.17  |
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥ १७ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे कृष्ण, हे परम योगी! मैं कैसे निरंतर आपका स्मरण कर सकूँ और आपको जान सकूँ? हे प्रभु! आपको किस-किस रूप में स्मरण करना चाहिए? |
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| O Krishna, O supreme yogi! How can I constantly think of you and know you? O Lord! In what forms should you be remembered? |
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