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mahabharat 6.33.7: हे कुन्तीपुत्र! एक कल्प के अन्त में सभी प्राणी मेरी प्रकृति में प्रवेश करते हैं और दूसरे कल्प के प्रारम्भ में मैं अपनी शक्ति से उन्हें पुनः उत्पन्न करता हूँ।   |   mahabharat अध्याय 6.33: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 9: परम गुह्य ज्ञान   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 33: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 9: परम गुह्य ज्ञान  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  6.33.7 
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥ ७ ॥
 
 
अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! एक कल्प के अन्त में सभी प्राणी मेरी प्रकृति में प्रवेश करते हैं और दूसरे कल्प के प्रारम्भ में मैं अपनी शक्ति से उन्हें पुनः उत्पन्न करता हूँ।
 
O son of Kunti, at the end of a kalpa all beings enter my nature, and at the beginning of another kalpa I recreate them with my power.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)