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श्लोक  6.33.31 
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति ॥ ३१ ॥
 
 
अनुवाद
वह तुरन्त पुण्यात्मा हो जाता है और स्थायी शांति प्राप्त कर लेता है। हे कुन्तीपुत्र! निर्भय होकर कहो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
 
He immediately becomes a virtuous person and attains permanent peace. O son of Kunti! Declare fearlessly that my devotee is never destroyed.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)